मंडी का कमलाह अभेद्य किला


हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के धर्मरपुर का अभेद्य माना जाने वाला ऐतिहासिक कमलाह किला आज मिटने की कगार पर पहुंच गया है. उचित रख रखाव न होने के कारण यह अभेद्य किला आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. वहीं जिला प्रशासन का कहना है कि कमलाह किले के संरक्षण के लिए मास्टर प्लान बनाया जाएगा.


मंडी जिला के धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले कमलाह गांव के किले का अस्तित्व आज खतरे में है. किले की प्राचीन दीवारें जर्जर होकर गिर रही हैं. राजाओं के जमाने के जो सामान थे उनका भी उचित रख रखाव नहीं किया जा रहा है. ऐतिहासिक तोफें हरकहीं पड़ी जंग खा रही हैं. आज लोग यहां सिर्फ बाबा कमलाहिया के मंदिर में दर्शनों के लिए ही आते ह


राजाओं के जमाने के प्राचीन जलाशय दूषित हो गए हैं. स्थानीय निवासी जोगिंद्र सिंह ठाकुर बताते हैं कि आज किले की प्राचीनता पूरी तरह से समाप्त हो गई है. भावी पीढ़ी के पास अब कमलाह किले में देखने लायक कुछ भी नहीं बचा ह


बाबा कमलाहिया मंदिर के पुजारी प्रकाश चंद बताते हैं कि किले और मंदिर में आने वालों के लिए यहां सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं है. न तो ठहरने की उचित व्यवस्था है और न ही खाने की. यहां तक कि शौचालयों का भी उचित प्रावधान नहीं है.


अगर कमलाह किले तक जाने वाले रास्तों की बात करें तो अब इसे चारों तरफ से सड़क सुविधा से जोड़ दिया गया है. स्थानीय लोग इसका श्रेय यहां के विधायक एवं मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर को देते हैं. स्थानीय निवासी राकेश कटवाल बताते हैं कि कमलाह किले तक जाना आसान हो गया है, क्योंकि अब इसे चारों दिशाओं से सड़क सुविधा से जोड़ दिया गया है. लेकिन राकेश यह भी मानते हैं कि अभी कमलाह किले के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है.






यह किला मंडी जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर है और इसकी उंचाई लगभग 4500 फीट है. इतिहास की बात करें तो मंडी रियासत के राजा हरी सेन 1605 ई में इस किले का निर्माण शुरू करवाया, लेकिन अपने जीवनकाल में वह इस किले को पूरी तरह से नहीं बना सके. बाद में उनके पुत्र सूर्यसेन ने 1625 ई में अपने पिता के अधूरे काम को पूरा किया

 

इस किले को इसलिए सुरक्षित माना जाता था क्योंकि यहां तक पहुंच पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था. किला एक चोटी पर है और उस चोटी तक पहुंचने के लिए एक ही रास्ता है. किले के उपरी भाग पर एक हवामहल है जहां से चारों दिशाओं पर नजर रखी जाती थी.





दुश्मन के आने का पहले ही पता चल जाता था और किले के चारों ओर मौजूद सैनिक हमलवरों को खदेड़ देते थे. इस किले तक पहुंचने की चढ़ाई इतनी कठिन है कि आज भी यहां पहुंच पाना काफी मुश्किल भरा होता है. यही कारण है कि दुश्मन किले तक पहुंचने से पहले ही भाग जाते थे और इसे सबसे सुरक्षित किला माना गया.





17वीं शताब्दी में राजा ईश्वरी सेन के शासन काल के दौरान कांगड़ा के राजा संसार चंद ने कमलाह किले पर कब्जा करने का षडयंत्र रखा लेकिन वह सफल नहीं हो सके. इसके बाद राजा खड़क सेन के पुत्र राज कुमार ने नौ निहाल सिख सेना को साथ लेकर मंडी व कमलाह किले पर आक्रमण किया, लेकिन वह कमलाह किले पर कब्जा नहीं कर सके.





साल 1840 में राजा नौ निहाल सिंह ने अंग्रेजी हकुमत के जनरल वेंचुरा को विशाल सेना सहित कमलाह किले पर कब्जा करने के लिए भेजा लेकिन वह भी कमलाह किले को जीत नहीं पाया. अंत में सिखों ने बड़ी कठिनाई से कमलाह किले पर विजयी पायी। 1845 में राजा बलबीर सेन ने अंग्रेजों की मदद से कमलाह किले को मुक्त करा लिया. 1846 ई को एक संधि के अनुसार यह किला ब्रिटिश सरकार के अधीन मंडी रियासत का गौरव बना.





यह किला आज की तारीख में सरकार और प्रशासन के अधीन है. ऐसे में इसके उचित रखरखाव की जिम्मेदारी भी इन्ही की बनती है. इस बारे में डीसी मंडी ऋग्वेद ठाकुर बताते हैं कि कमलाह किला एक ऐतिहासिक धरोहर है और इसे संरक्षित रखने के पूरे प्रयास किए जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि किले के संरक्षण के लिए एक मास्टर प्लान बनाया जा रहा है और इसे मंजूरी के लिए सरकार को भेजा जाएगा. पैसों की स्वीकृति मिलते ही किले को एक नया स्वरूप दिया जाएगा





आज यह किला न सिर्फ एक किला है बल्कि एक ऐसी धरोहर के रूप में है जिसकी मिसाल हर कोई देता है. राजा ने जिस सोच के साथ इस किले का निर्माण करवाया था, उस सोच की तरह आज इसका संरक्षण न हो पाने के कारण यह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है